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The Role of Irrigation Water Quality and pH Management in Nutrient Availability and Crop Productivity

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  1 . Introduction Many farmers in India believe that higher fertilizer application leads to higher crop yields. However, modern agricultural science demonstrates that productivity depends not only on fertilizer quantity but also on nutrient availability, uptake, and utilization efficiency by plants. If irrigation water quality is unsuitable, even expensive fertilizers may fail to deliver their full agronomic potential. Irrigation sources such as wells, borewells, canals, ponds, and rivers may contain varying concentrations of calcium (Ca²⁺), magnesium (Mg²⁺), and bicarbonates (HCO₃⁻). Water containing high calcium and magnesium concentrations is generally classified as hard water. When hardness occurs alongside high alkalinity, it can affect fertilizer compatibility, nutrient availability, soil properties, and irrigation-system performance. 2. What Happens When Fertilizers Are Mixed with Hard Water? When water-soluble fertilizers are injected into irrigation water with high alkali...

FCRA Bill 2026: विदेशी फंडिंग पर नियंत्रण नहीं, भारत के राष्ट्रीय हित की सुरक्षा

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 बल्कि तथ्यों और परिणामों से भी सवाल पूछती है। कानून का विरोध करना लोकतांत्रिक अधिकार है। लेकिन कानून को गलत धार्मिक रंग देना सामाजिक जिम्मेदारी नहीं है। यदि किसी प्रावधान पर वास्तविक आपत्ति है तो संसद में बहस होनी चाहिए। विशेषज्ञों की राय ली जानी चाहिए। आवश्यक हो तो Joint Parliamentary Committee को भेजा जा सकता है। लेकिन समाज को धर्म के आधार पर बांटना समाधान नहीं है। भारत की संप्रभुता सर्वोपरि विदेशी सहायता से अस्पताल, शिक्षा, गरीबों की सहायता, आपदा राहत और अनेक सामाजिक कार्य हो सकते हैं। ऐसे वास्तविक और ईमानदार सामाजिक कार्यों का सम्मान होना चाहिए। लेकिन विदेशी धन के साथ विदेशी प्रभाव का प्रश्न भी उठ सकता है। इसलिए किसी भी संप्रभु देश को यह अधिकार है कि वह तय करे कि उसके यहां विदेशी योगदान किन नियमों के अंतर्गत स्वीकार और उपयोग किया जाएगा। भारत भी यही कर रहा है। यह किसी धर्म, भाषा या समुदाय का प्रश्न नहीं है। यह प्रश्न है— क्या भारत अपने कानून स्वयं बनाएगा? क्या भारत अपने राष्ट्रीय हितों की रक्षा करेगा? क्या भारत विदेशी धन के उपयोग में पारदर्शिता सुनिश्चित करेगा? इन तीनों प्रश्न...

राज्यातील धरणे भरू लागली... पण जलव्यवस्थापनाची खरी परीक्षा आता सुरू होते!

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आठ दिवसांत १५२ टीएमसी पाण्याची भर – महाराष्ट्रासाठी दिलासादायक चित्र जुलै महिन्यात झालेल्या मुसळधार पावसामुळे महाराष्ट्रातील धरणांमध्ये मोठ्या प्रमाणावर पाण्याची आवक झाली असून , राज्याच्या जलसाठ्याला मोठा दिलासा मिळाला आहे. जलसंपदा विभागाच्या माहितीनुसार , राज्यातील ३ , ०२९ लहान , मध्यम आणि मोठ्या प्रकल्पांची एकूण साठवण क्षमता १ , ४२२.१२ टीएमसी आहे. त्यापैकी ९७९.४० टीएमसी (६८.८७%) पाणीसाठा सध्या उपलब्ध आहे. विशेष म्हणजे , केवळ आठ दिवसांत १५२ टीएमसी पाण्याची भर पडली आहे. त्यामुळे राज्यातील ४९ धरणांतून नियंत्रित स्वरूपात पाण्याचा विसर्ग सुरू करण्यात आला आहे. हा आकडा जुलै महिन्यात झालेल्या दमदार पावसाचे महत्त्व अधोरेखित करतो.   पश्चिम महाराष्ट्र आणि कोकणात सर्वाधिक लाभ यंदाच्या पावसामुळे पश्चिम घाट परिसरातील धरणांमध्ये मोठ्या प्रमाणात पाण्याची आवक झाली आहे. विभागनिहाय पाणीसाठ्याचा आढावा घेतला तर— कोकण विभाग – ८४% पुणे विभाग – ८२% नाशिक विभाग – ६९% नागपूर विभाग – ५७% अमरावती विभाग – ५५% छत्रपती संभाजीनगर विभाग – ४३% यावरून स्पष्ट होते की पश्चिम महा...

जल संरक्षण कोई अभियान नहीं—यह मानव सभ्यता की संस्कृति है

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  जब पानी बहना बंद हो जाएगा… कल्पना कीजिए कि कल सुबह आपकी आँख खुलती है। आप रसोई में पानी पीने के लिए जाते हैं। नल खोलते हैं , लेकिन एक भी बूंद नहीं निकलती। आपका बच्चा स्कूल जाने से पहले पानी माँगता है , पर आपके पास उसे देने के लिए कुछ नहीं है। खेतों में खड़ी फसलें धीरे-धीरे सूखने लगती हैं। हर सुबह आपके आँगन में चहचहाने वाले पक्षी कहीं दिखाई नहीं देते। वह नदी , जिसके किनारे पीढ़ियों ने पर्व-त्योहार मनाए , अब केवल फटी हुई धरती का एक निर्जीव विस्तार बन चुकी है। जीवन हमेशा किसी विस्फोट के साथ समाप्त नहीं होता। कई बार वह चुपचाप , बिना कोई शोर किए , एक-एक बूंद के साथ हमसे दूर चला जाता है। नीले ग्रह का सबसे बड़ा भ्रम अंतरिक्ष से देखने पर पृथ्वी एक सुंदर नीले रत्न की भाँति दिखाई देती है। इसी कारण इसे " ब्लू प्लैनेट" कहा जाता है। इसे देखकर ऐसा प्रतीत होता है मानो पृथ्वी पर जल का अथाह भंडार हो। किंतु इस सौंदर्य के पीछे प्रकृति का एक अत्यंत कठोर सत्य छिपा हुआ है। पृथ्वी पर लगभग 1.386 अरब घन किलोमीटर जल उपलब्ध है , परंतु इसका अधिकांश भाग मानव उपयोग के योग्य नहीं है। ·...