जैव उर्वरकों (Biofertilizers) की नई क्रांति और धरती के नीचे छिपी अदृश्य दुनिया
"भविष्य की खेती रासायनिक उर्वरकों पर नहीं, बल्कि सूक्ष्मजीवों पर आधारित होगी".
पिछले सौ वर्षों में रासायनिक उर्वरकों ने वैश्विक कृषि में अभूतपूर्व परिवर्तन लाया। बढ़ती जनसंख्या, खाद्यान्न उत्पादन की बढ़ती आवश्यकता और आधुनिक कृषि प्रणाली को मजबूत बनाने में इनकी महत्वपूर्ण भूमिका रही। लेकिन इस सफलता की एक कीमत भी चुकानी पड़ी। मिट्टी में जैविक कार्बन की कमी, लाभकारी सूक्ष्मजीवों की घटती संख्या, पोषक तत्वों का क्षरण, भूजल प्रदूषण, बढ़ती उत्पादन लागत तथा उर्वरकों के उपयोग की घटती दक्षता जैसी समस्याएँ आज कृषि के सामने गंभीर चुनौती बन चुकी हैं।
आज कृषि विज्ञान एक नए युग में प्रवेश कर रहा है।
पहले प्रश्न यह था—
"फसल को कितना उर्वरक देना चाहिए?"
लेकिन आज विज्ञान इससे भी अधिक महत्वपूर्ण प्रश्न पूछ रहा है—
"मिट्टी में रहने वाले जीवित सूक्ष्मजीव पौधों को प्राकृतिक रूप से अधिक
सक्षम कैसे बना सकते हैं?"
इस प्रश्न का उत्तर है—जैव उर्वरक (Biofertilizers)।
मिट्टी
केवल धूल नहीं, बल्कि एक जीवित ब्रह्मांड है
हम अक्सर मिट्टी को केवल पौधों को उगाने का माध्यम समझते हैं, जबकि वास्तविकता
इससे कहीं अधिक अद्भुत है। केवल एक ग्राम स्वस्थ मिट्टी में अरबों जीवाणु, हजारों प्रकार की फफूंद, शैवाल, प्रोटोजोआ, निमेटोड तथा अनगिनत जैवरासायनिक
प्रक्रियाएँ निरंतर सक्रिय रहती हैं।
ये सूक्ष्मजीव अनेक महत्वपूर्ण कार्य करते हैं—
- वायुमंडलीय
नाइट्रोजन का स्थिरीकरण करते हैं।
- मिट्टी
में उपलब्ध न होने वाले फॉस्फोरस को पौधों के लिए उपलब्ध कराते हैं।
- खनिजों
से पोटाश को मुक्त करते हैं।
- पौधों
की वृद्धि के लिए आवश्यक हार्मोन बनाते हैं।
- जड़ों
के विकास और फैलाव को बढ़ाते हैं।
- सूखा, अधिक तापमान
तथा लवणीय परिस्थितियों को सहन करने की क्षमता बढ़ाते हैं।
- रोगजनक
सूक्ष्मजीवों से जड़ों की रक्षा करते हैं।
- पोषक
तत्वों के अवशोषण को अधिक प्रभावी बनाते हैं।
यही कारण है कि भविष्य की कृषि केवल पौधों का पोषण करने तक सीमित नहीं
रहेगी, बल्कि मिट्टी के जैविक जीवन का संरक्षण और संवर्धन उसका सबसे
महत्वपूर्ण उद्देश्य होगा।
हर जड़ के
नीचे छिपी है एक अदृश्य अर्थव्यवस्था
हर पौधे की जड़ निरंतर शर्करा, अमीनो अम्ल, प्रोटीन,
विटामिन और अनेक जैविक यौगिक अपने आसपास की मिट्टी में छोड़ती रहती
है। इस क्षेत्र को वैज्ञानिक भाषा में राइजोस्फीयर (Rhizosphere)
कहा जाता है।
राइजोस्फीयर वास्तव में एक अदृश्य जैविक बाज़ार है।
यहाँ पौधे सूक्ष्मजीवों को भोजन उपलब्ध कराते हैं और बदले में सूक्ष्मजीव
पौधों को पोषक तत्व, रोगों से सुरक्षा, बेहतर जड़ विकास तथा अधिक उत्पादन
क्षमता प्रदान करते हैं।
यह साझेदारी मानव सभ्यता से भी कहीं अधिक प्राचीन है और पृथ्वी पर जीवन के
सबसे सफल सहजीवी संबंधों में से एक मानी जाती है।
सूक्ष्मजीवों
की दुनिया भी हमारी दुनिया जैसी है
मिट्टी के भीतर रहने वाले सूक्ष्मजीवों का संसार मानव सभ्यता का एक सूक्ष्म
प्रतिबिंब है। जैसे मनुष्य गाँवों, कस्बों और महानगरों में समाज बनाकर
रहते हैं, वैसे ही अरबों सूक्ष्मजीव पौधों की जड़ों के आसपास
विशाल कॉलोनियाँ बनाकर अपना जीवन व्यतीत करते हैं।
उनकी दुनिया में भी सहयोग है, प्रतिस्पर्धा है, संवाद है और परस्पर निर्भरता है। कुछ सूक्ष्मजीव पौधों को पोषण उपलब्ध
कराते हैं, तो कुछ अदृश्य प्रहरी बनकर उन्हें रोगों से बचाते
हैं। अनेक सूक्ष्मजीव मिलकर पूरे पारिस्थितिकी तंत्र को संतुलित रखते हैं, जबकि कुछ स्थान, भोजन और अस्तित्व के लिए निरंतर
संघर्ष करते रहते हैं।
जैसे पड़ोसी देशों के बीच सीमाओं और संसाधनों को लेकर संघर्ष होते हैं, वैसे ही
सूक्ष्मजीवों की दुनिया में भी रासायनिक संकेतों, एंटीबायोटिक्स
और जैवरासायनिक हथियारों के माध्यम से अदृश्य युद्ध चलते रहते हैं। इन संघर्षों
में जीत और हार दोनों होती हैं, लेकिन इन्हीं के कारण मिट्टी
का जैविक संतुलन बना रहता है।
यदि पृथ्वी की सबसे विशाल और सबसे प्राचीन सभ्यता कहीं मौजूद है, तो वह हमारे पैरों
के नीचे एक मुट्ठी स्वस्थ मिट्टी में है, जहाँ हर क्षण जीवन,
संघर्ष, सहयोग और सृजन की अद्भुत कहानी लिखी
जा रही है।
जैव
उर्वरक क्या हैं?
जैव उर्वरक ऐसे जीवित सूक्ष्मजीव उत्पाद हैं जो मिट्टी की प्राकृतिक जैविक
प्रक्रियाओं को सक्रिय करके पौधों को आवश्यक पोषक तत्व उपलब्ध कराते हैं।
ये रासायनिक उर्वरकों का विकल्प नहीं हैं, बल्कि उनकी उपयोग दक्षता बढ़ाने,
मिट्टी के स्वास्थ्य में सुधार करने और दीर्घकालीन टिकाऊ कृषि
प्रणाली विकसित करने वाले जैविक सहयोगी हैं।
कृषि में
परिवर्तन लाने वाले प्रमुख जैव उर्वरक
आज कृषि में अनेक प्रकार के जैव उर्वरकों का सफलतापूर्वक उपयोग किया जा रहा
है।
राइजोबियम (Rhizobium) दलहनी फसलों में वायुमंडलीय नाइट्रोजन
को स्थिर कर रासायनिक नाइट्रोजन उर्वरकों की आवश्यकता कम करता है।
एज़ोटोबैक्टर (Azotobacter) तथा एज़ोस्पिरिलम (Azospirillum)
न केवल नाइट्रोजन स्थिरीकरण करते हैं बल्कि पौधों की जड़ों की
वृद्धि बढ़ाने वाले हार्मोन भी उत्पन्न करते हैं।
फॉस्फेट घुलनशील जीवाणु (PSB) मिट्टी में बंद
पड़े फॉस्फोरस को पौधों के लिए उपलब्ध कराते हैं, जबकि पोटाश
घुलनशील जीवाणु (KSB) मिट्टी के खनिजों से पोटाश
मुक्त कर उसकी उपलब्धता बढ़ाते हैं।
माइकोराइजा (Mycorrhiza) नामक लाभकारी फफूंद जड़ों का विस्तार
कई गुना बढ़ाकर पानी और पोषक तत्वों के अवशोषण को अत्यधिक प्रभावी बना देती है।
वैज्ञानिक इसे अक्सर "धरती के नीचे का इंटरनेट" भी कहते हैं।
ऊस जैसी फसलों में एसीटोबैक्टर (Acetobacter) जैविक नाइट्रोजन उपलब्ध कराकर वृद्धि
और शर्करा संचयन में महत्वपूर्ण योगदान देता है।
भविष्य
जैव उर्वरकों का है
आधुनिक शोध अब किसी एक सूक्ष्मजीव तक सीमित नहीं है। भविष्य Microbial Consortia अर्थात अनेक
लाभकारी सूक्ष्मजीवों के संतुलित समुदायों का है।
कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI), माइक्रोबायोम इंजीनियरिंग, नैनो-जैव
उर्वरक, जैविक बीज उपचार तथा जलवायु परिवर्तन के प्रति
सहनशील सूक्ष्मजीव कृषि अनुसंधान के सबसे उभरते हुए क्षेत्र बन चुके हैं।
आने वाले वर्षों में किसानों को केवल मृदा परीक्षण के आधार पर नहीं, बल्कि मिट्टी के Microbial
Fingerprint के आधार पर भी उर्वरक एवं जैव उर्वरक संबंधी
सिफारिशें प्राप्त होंगी।
क्या जैव
उर्वरक रासायनिक उर्वरकों का स्थान ले लेंगे?
यह सबसे बड़ा भ्रम है।
जैव उर्वरक रासायनिक उर्वरकों का त्वरित विकल्प नहीं हैं और न ही उनका
उद्देश्य उन्हें पूरी तरह समाप्त करना है।
उनकी वास्तविक शक्ति है—
- उर्वरकों
के उपयोग की दक्षता बढ़ाना।
- मिट्टी
के जैविक जीवन को पुनर्जीवित करना।
- पोषक
तत्वों की उपलब्धता बढ़ाना।
- टिकाऊ
एवं लचीली कृषि प्रणाली विकसित करना।
- मिट्टी
के दीर्घकालीन स्वास्थ्य का संरक्षण करना।
भविष्य की कृषि रासायनिक और जैविक पोषण प्रबंधन के संतुलित समन्वय पर
आधारित होगी।
निष्कर्ष
कृषि की अगली सबसे बड़ी क्रांति ट्रैक्टर, ड्रोन या उपग्रहों से नहीं आएगी। वह
हमारे पैरों के नीचे, मिट्टी में रहने वाले अरबों
सूक्ष्मजीवों के माध्यम से जन्म लेगी।
हर स्वस्थ जड़, हर लाभकारी सूक्ष्मजीव और जैविक रूप से सक्रिय मिट्टी का प्रत्येक कण
खाद्य सुरक्षा, जलवायु परिवर्तन से मुकाबले और टिकाऊ कृषि का
आधार है।
जैव उर्वरक केवल कृषि निवेश नहीं हैं, बल्कि प्रकृति के
जीवित साझेदार हैं, जो पौधों को पुनः प्राकृतिक पोषण चक्र से
जोड़ते हैं।
भविष्य की कृषि उन खेतों की होगी जो सबसे अधिक रासायनिक उर्वरक नहीं, बल्कि सबसे
समृद्ध मृदा सूक्ष्मजीव समुदाय का निर्माण करेंगे।
क्योंकि अगली हरित क्रांति केवल रसायनों से नहीं, बल्कि जीवन से
संचालित होगी।
— विजयकुमार सरूर
M.Sc. (Agro-Chemicals & Pest Management)

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