pH संतुलन: आधुनिक कृषि की सफलता का रहस्य

आज की आधुनिक कृषि में केवल पर्याप्त सिंचाई करना ही पर्याप्त नहीं है, बल्कि उचित गुणवत्ता वाले सिंचाई जल का उपयोग करना भी उतना ही आवश्यक है। ड्रिप सिंचाई एवं फर्टिगेशन प्रणाली की सफलता काफी हद तक सिंचाई जल की रासायनिक गुणवत्ता पर निर्भर करती है। जल का pH, कठोरता (Hardness) तथा बाइकार्बोनेट (HCO₃⁻) की मात्रा यदि नियंत्रित न हो, तो यह न केवल सिंचाई प्रणाली की कार्यक्षमता को प्रभावित करती है, बल्कि पौधों द्वारा पोषक तत्वों के अवशोषण को भी गंभीर रूप से बाधित करती है।

कठोर जल क्यों बनता है?

भारत में अधिकांश सिंचाई स्रोत—जैसे कुएँ, बोरवेल, नहर, तालाब एवं नदी—ऐसा जल प्रदान करते हैं जिसमें कैल्शियम (Ca²⁺), मैग्नीशियम (Mg²⁺) तथा बाइकार्बोनेट (HCO₃⁻) की मात्रा अपेक्षाकृत अधिक होती है। यही तत्व जल को कठोर (Hard Water) बनाते हैं।

जब ऐसे कठोर जल में जल में घुलनशील उर्वरकों (Water Soluble Fertilizers) का मिश्रण किया जाता है, तब कैल्शियम, मैग्नीशियम एवं बाइकार्बोनेट अनेक उर्वरकों के साथ रासायनिक अभिक्रिया करके अघुलनशील अवक्षेप (Precipitates) बनाते हैं। यही अवक्षेप फर्टिगेशन टैंक, फिल्टर, पाइपलाइन तथा ड्रिपर के सूक्ष्म छिद्रों में जमा होकर प्रणाली को अवरुद्ध कर देते हैं।

ड्रिप सिंचाई प्रणाली पर दुष्प्रभाव

ड्रिप सिंचाई प्रणाली अत्यंत सूक्ष्म जल प्रवाह सिद्धांत पर कार्य करती है। ड्रिपर के छोटे-छोटे छिद्रों में यदि अवक्षेप जमा हो जाएँ तो जल का प्रवाह असमान हो जाता है।

इसके परिणामस्वरूप—

  • ड्रिपर एवं फिल्टर बार-बार जाम होने लगते हैं।

  • प्रत्येक पौधे तक समान मात्रा में पानी नहीं पहुँचता।

  • फर्टिगेशन के दौरान उर्वरकों का वितरण असमान हो जाता है।

  • पौधों की वृद्धि में असमानता उत्पन्न होती है।

  • उत्पादन एवं गुणवत्ता दोनों प्रभावित होते हैं।

  • सिंचाई प्रणाली के रखरखाव की लागत बढ़ जाती है।

अर्थात् जल की गुणवत्ता में छोटी-सी कमी पूरे ड्रिप सिस्टम की दक्षता को प्रभावित कर सकती है।

बाइकार्बोनेट की अधिकता क्यों है हानिकारक?

सिंचाई जल में अधिक मात्रा में उपस्थित बाइकार्बोनेट आयन (HCO₃⁻) पौधों के लिए अनेक अप्रत्यक्ष समस्याएँ उत्पन्न करता है।

यह—

  • जल का pH बढ़ाता है।

  • कैल्शियम एवं मैग्नीशियम के साथ मिलकर अघुलनशील कार्बोनेट बनाता है।

  • फॉस्फोरस को पौधों के लिए अनुपलब्ध बना देता है।

  • सूक्ष्म पोषक तत्वों जैसे जिंक, आयरन, मैंगनीज एवं कॉपर की उपलब्धता कम कर देता है।

विशेष रूप से जब फॉस्फेट उर्वरकों का प्रयोग किया जाता है, तब उच्च pH एवं कैल्शियम की उपस्थिति में कैल्शियम फॉस्फेट तथा मैग्नीशियम फॉस्फेट जैसे अघुलनशील यौगिक बनते हैं। ये यौगिक पाइपलाइन एवं ड्रिपर में जमकर सिंचाई प्रणाली को पूर्णतः अवरुद्ध कर सकते हैं।

क्षारीय एवं कैल्केरियस मिट्टियों में समस्या और गंभीर हो जाती है

जिन मिट्टियों का pH 7.5 से अधिक होता है तथा जिनमें कैल्शियम कार्बोनेट की मात्रा अधिक होती है, उन्हें कैल्केरियस (Calcareous) अथवा क्षारीय मिट्टी कहा जाता है।

ऐसी मिट्टियों में—

  • फॉस्फोरस स्थायी रूप से स्थिर (Fixed) हो जाता है।

  • जिंक, आयरन एवं मैंगनीज जैसे सूक्ष्म पोषक तत्व पौधों को उपलब्ध नहीं हो पाते।

  • पौधों में पोषक तत्वों की कमी के लक्षण दिखाई देने लगते हैं।

  • उर्वरकों की उपयोग दक्षता (Nutrient Use Efficiency) घट जाती है।

फलस्वरूप किसान अधिक उर्वरक उपयोग करने के बावजूद अपेक्षित उत्पादन प्राप्त नहीं कर पाते।

सिंचाई जल का अम्लीकरण (Water Acidification): एक वैज्ञानिक समाधान

इन समस्याओं का सबसे प्रभावी समाधान है सिंचाई जल का नियंत्रित अम्लीकरण (Water Acidification)।

इस प्रक्रिया में उपयुक्त अम्ल की नियंत्रित मात्रा मिलाकर सिंचाई जल का pH लगभग 6.0 से 6.5 तक लाया जाता है। यह सीमा अधिकांश फसलों एवं फर्टिगेशन प्रणालियों के लिए आदर्श मानी जाती है।

जब जल का pH इस स्तर पर नियंत्रित किया जाता है, तब—

  • बाइकार्बोनेट की मात्रा प्रभावी रूप से कम होती है।

  • कैल्शियम एवं मैग्नीशियम के अवक्षेप बनने की संभावना घटती है।

  • ड्रिपर एवं फिल्टर में क्लॉगिंग कम होती है।

  • फॉस्फोरस, जिंक, आयरन एवं अन्य सूक्ष्म पोषक तत्वों की उपलब्धता बढ़ती है।

  • फर्टिगेशन की दक्षता में उल्लेखनीय सुधार होता है।

  • सिंचाई जल का मिट्टी में प्रवेश (Water Infiltration) बेहतर होता है।

  • सोडिक एवं क्षारीय मिट्टियों के दुष्प्रभाव कम होने लगते हैं।

  • पौधों की वृद्धि अधिक समान एवं स्वस्थ होती है।

अम्लीकरण के लिए कौन-से अम्ल उपयोग किए जाते हैं?

व्यावसायिक फर्टिगेशन प्रणालियों में सामान्यतः निम्न अम्लों का उपयोग किया जाता है—

  • सल्फ्यूरिक अम्ल (Sulfuric Acid) – बाइकार्बोनेट को निष्क्रिय करने एवं जल का pH कम करने में अत्यंत प्रभावी।

  • फॉस्फोरिक अम्ल (Phosphoric Acid) – pH नियंत्रण के साथ-साथ फॉस्फोरस की आपूर्ति भी करता है।

इन अम्लों का उपयोग सदैव प्रशिक्षित तकनीकी मार्गदर्शन में, उचित सुरक्षा उपकरणों तथा स्वचालित डोजिंग प्रणाली द्वारा ही किया जाना चाहिए।

निष्कर्ष

ड्रिप सिंचाई एवं फर्टिगेशन केवल आधुनिक तकनीक नहीं, बल्कि वैज्ञानिक जल एवं पोषक तत्व प्रबंधन का आधार हैं। यदि सिंचाई जल का pH, कठोरता एवं बाइकार्बोनेट नियंत्रित नहीं किए जाते, तो सर्वोत्तम उर्वरक एवं उन्नत सिंचाई प्रणाली भी अपेक्षित परिणाम नहीं दे सकती।

सिंचाई जल का pH 6.0–6.5 के बीच बनाए रखना ड्रिप प्रणाली की दीर्घायु, उर्वरकों की अधिकतम उपयोग दक्षता, पोषक तत्वों की बेहतर उपलब्धता तथा उच्च गुणवत्ता वाले उत्पादन की दिशा में एक महत्वपूर्ण वैज्ञानिक कदम है।

"सही pH वाला सिंचाई जल केवल ड्रिप सिस्टम की सुरक्षा नहीं करता, बल्कि प्रत्येक बूंद पानी और प्रत्येक ग्राम उर्वरक की उपयोगिता को भी अधिकतम बनाता है। यही आधुनिक, टिकाऊ एवं लाभकारी कृषि की पहचान है।"

विजयकुमार एम. सरूर

संदर्भ

  1. Imas, P. & Cohen, A. (2009–10). Improving the pH of Irrigation Waters with Acidic Fertilizers.

  2. Dr. Kelly T. Morgan, University of Florida. Effect of Irrigation Water Acidification and Soil pH on Citrus Nutrient Availability.

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