जल संरक्षण कोई अभियान नहीं—यह मानव सभ्यता की संस्कृति है
जब पानी बहना बंद हो जाएगा…
कल्पना कीजिए कि कल सुबह आपकी आँख खुलती है। आप रसोई में
पानी पीने के लिए जाते हैं। नल खोलते हैं,
लेकिन एक भी बूंद नहीं निकलती। आपका बच्चा स्कूल जाने से पहले पानी
माँगता है, पर आपके पास उसे देने के लिए कुछ नहीं है। खेतों
में खड़ी फसलें धीरे-धीरे सूखने लगती हैं। हर सुबह आपके आँगन में चहचहाने वाले
पक्षी कहीं दिखाई नहीं देते। वह नदी, जिसके किनारे पीढ़ियों
ने पर्व-त्योहार मनाए, अब केवल फटी हुई धरती का एक निर्जीव
विस्तार बन चुकी है।
जीवन हमेशा किसी विस्फोट के साथ समाप्त नहीं होता। कई बार
वह चुपचाप, बिना
कोई शोर किए, एक-एक बूंद के साथ हमसे दूर चला जाता है।
नीले ग्रह का सबसे बड़ा
भ्रम
अंतरिक्ष से देखने पर पृथ्वी एक सुंदर नीले रत्न की भाँति
दिखाई देती है। इसी कारण इसे "ब्लू प्लैनेट" कहा जाता है। इसे देखकर ऐसा प्रतीत
होता है मानो पृथ्वी पर जल का अथाह भंडार हो। किंतु इस सौंदर्य के पीछे प्रकृति का
एक अत्यंत कठोर सत्य छिपा हुआ है।
पृथ्वी पर लगभग 1.386 अरब घन किलोमीटर जल उपलब्ध है, परंतु इसका अधिकांश भाग
मानव उपयोग के योग्य नहीं है।
·
लगभग
96.5% जल
महासागरों का खारा पानी है।
·
केवल
2.5% जल
मीठा (Fresh Water)
है।
·
इस
मीठे जल का अधिकांश भाग हिमनदों और बर्फ की चादरों में बंद है।
·
शेष
का बड़ा हिस्सा धरती की गहराइयों में भूजल के रूप में छिपा हुआ है।
नदियों,
झीलों, तालाबों, आर्द्रभूमियों
और वातावरण में उपलब्ध जल, पृथ्वी के कुल जल का अत्यंत छोटा
हिस्सा है। यही वह जल है जो प्रत्येक मनुष्य की प्यास बुझाता है, प्रत्येक खेत में अन्न उगाता है और प्रत्येक घर तक जीवन पहुँचाता है। समस्या
यह नहीं कि पृथ्वी पर जल कम है।
समस्या यह है कि मनुष्य ने जल का मूल्य
समझना छोड़ दिया है।
एक गिलास पानी, जो पूरी
दुनिया का है
कल्पना कीजिए कि पृथ्वी का समस्त जल केवल 10,000 लीटर की एक टंकी में समा जाए।
उसमें से—
·
9,654
लीटर
खारा समुद्री जल होगा।
·
174
लीटर
बर्फ के रूप में बंद होगा।
·
76
लीटर
धरती के भीतर भूजल के रूप में रहेगा।
और संपूर्ण मानवता,
जंगलों, नदियों, पशु-पक्षियों,
उद्योगों, शहरों तथा कृषि के लिए उपलब्ध होगा—
सिर्फ़ तीन लीटर जल।
अब कल्पना कीजिए कि इन तीन लीटर पानी को एक ही गिलास में भर
दिया जाए।
उसी एक गिलास से—
·
आठ
अरब लोगों की प्यास बुझनी है।
·
खेतों
को सिंचित होना है।
·
नदियों
को बहना है।
·
जंगलों
को जीवित रहना है।
·
उद्योगों
को चलना है।
·
आने
वाली पीढ़ियों का भविष्य सुरक्षित होना है।
अब स्वयं से पूछिए—
क्या कोई जानबूझकर उस गिलास को गिरा देगा?
दुर्भाग्य से मानवता प्रतिदिन यही कर रही है।
भीषण सूखे के दिनों में ऐसी कहानियाँ जन्म लेती हैं जो कभी
समाचारों की सुर्खियाँ नहीं बनतीं।एक माँ के घर में केवल एक गिलास पानी बचा है।उसका
बच्चा प्यासा है।वह मुस्कुराकर कहती है—"मुझे प्यास नहीं लगी है।" जबकि सच यह है कि उसे भी उतनी
ही प्यास लगी है। वह केवल इसलिए स्वयं को रोक लेती है ताकि उसका बच्चा पानी पी
सके। यही मातृत्व है। अब कल्पना कीजिए—
यदि एक दिन वह अंतिम गिलास भी समाप्त हो जाए। तब पानी केवल
प्राकृतिक संसाधन नहीं रहेगा। वह माँ के त्याग का अंतिम प्रतीक बन जाएगा।
कोई भी वृक्ष कभी किसी के दरवाजे पर जाकर पानी नहीं माँगता।
वह मौन खड़ा रहता है। धीरे-धीरे उसकी पत्तियाँ पीली पड़ जाती हैं। शाखाएँ सूखने
लगती हैं। फल समाप्त हो जाते हैं। पक्षी उसका साथ छोड़ देते हैं। और एक दिन वह
धराशायी हो जाता है। इसलिए नहीं कि उसकी आयु पूरी हो गई थी। बल्कि इसलिए कि किसी
ने उसकी मौन प्यास को नहीं पहचाना। प्रकृति कभी ऊँची आवाज़ में नहीं रोती। वह
चुपचाप पीड़ा सहती है।
हम कहते हैं कि भोजन जीवन है।
परंतु भोजन से पहले—जल है।
गेहूँ की प्रत्येक बाल से पहले—बारिश की एक बूंद थी।
आम के प्रत्येक फल से पहले—मिट्टी की नमी थी।
हर फूल के खिलने से पहले—उसकी जड़ों तक पहुँचा हुआ जल
था।
हमारी थाली का प्रत्येक निवाला एक ऐसी बूंद से शुरू होता है
जिसे अधिकांश लोगों ने कभी देखा भी नहीं।
जल नहीं तो खेती नहीं।
खेती नहीं तो भोजन नहीं।
भोजन नहीं तो सभ्यता नहीं।
लाखों वर्षों तक प्रकृति ने जल का संतुलन बनाए रखा।बादल
चलते रहे। बारिश होती रही। नदियाँ बहती रहीं। भूजल पुनर्भरित होता रहा। वृक्ष
वातावरण में नमी लौटाते रहे। सब कुछ संतुलित था। फिर मनुष्य आया। उसने जंगल काट
दिए। धरती को कंक्रीट से ढँक दिया। नदियों को प्रदूषित कर दिया। भूजल को उसकी
पुनर्भरण क्षमता से कहीं अधिक गति से निकालना शुरू कर दिया।
आज हम पूछते हैं— नदियाँ क्यों सूख रही हैं?
उत्तर बहुत सरल है—हमने प्रकृति से केवल लिया, लौटाया कुछ नहीं।
यदि आप किसी किसान से पूछें कि पानी क्या है, तो वह आँकड़ों में
उत्तर नहीं देगा। वह कहेगा—
"समय पर बारिश हो जाए तो मेरे बच्चों के चेहरे
पर मुस्कान लौट आती है।" वह जानता है कि सही समय पर दी गई एक
सिंचाई पूरी फसल बचा सकती है। और एक सिंचाई की कमी महीनों की मेहनत नष्ट कर सकती
है। किसान पानी को लीटर में नहीं मापता। वह उसे आशा में मापता है।
दो बच्चों की कल्पना कीजिए। पहला बच्चा ब्रश करते समय नल
खुला छोड़ देता है। दूसरा प्रत्येक बार नल बंद कर देता है। आज दोनों में अंतर बहुत
छोटा लगता है। लेकिन बीस वर्षों बाद—
एक ने अनजाने में एक झील जितना पानी व्यर्थ बहा दिया होगा। दूसरे
ने उतना ही पानी बचा लिया होगा।
बड़े परिवर्तन सदैव छोटी आदतों से प्रारम्भ
होते हैं।
आपके हाथ में जो पानी का गिलास है— वह सीधे नल से नहीं आया।
संभव है कि वह वर्षों पहले किसी पर्वत पर वर्षा बनकर गिरा हो। घने जंगलों से होकर
बहा हो। नदी बना हो। धरती के भीतर वर्षों तक यात्रा की हो। चट्टानों से छनकर कुएँ
तक पहुँचा हो। फिर पंप के माध्यम से गाँव पहुँचा हो। शुद्ध किया गया हो। संग्रहित
किया गया हो। और अंततः आपके घर तक पहुँचा हो।
जिस बूंद ने दशकों की यात्रा की—उसे हम कुछ ही सेकंड में
व्यर्थ बहा देते हैं।
विश्व के उपलब्ध मीठे जल का लगभग 70 प्रतिशत भाग कृषि में उपयोग होता है। भारत
जैसे देशों में यह अनुपात इससे भी अधिक है। समस्या खेती नहीं है। समस्या जल की
बर्बादी है। बाढ़ सिंचाई। अनियोजित सिंचाई। बहाव।
वाष्पीकरण। जल प्रबंधन की कमी।
ये सभी प्रतिदिन करोड़ों लीटर पानी नष्ट कर देते हैं।
खेत में बचाई गई प्रत्येक बूंद किसी अन्य स्थान पर किसी की
प्यास बुझा सकती है।
इसलिए सूक्ष्म सिंचाई (Micro Irrigation), ड्रिप सिंचाई, स्प्रिंकलर, वर्षा जल संचयन और वैज्ञानिक जल प्रबंधन केवल आधुनिक तकनीक नहीं हैं—
वे आने वाली पीढ़ियों के प्रति हमारी नैतिक जिम्मेदारी हैं।
बहुत से लोग मानते हैं कि जल बचाना केवल सरकार का दायित्व
है। यह भ्रम है। जल संरक्षण की शुरुआत घर से होती है। एक टपकता हुआ नल। ओवरफ्लो
होती पानी की टंकी। नदियों में फेंका गया कचरा। वर्षा जल संचयन की उपेक्षा। ये
छोटी-छोटी गलतियाँ मिलकर राष्ट्रीय जल संकट का कारण बनती हैं।
उसी प्रकार—
एक रिसाव रोकना।
एक वृक्ष लगाना।
एक बाल्टी पानी बचाना।
एक लीटर जल का पुनः उपयोग करना।
एक बच्चे को जल का महत्व सिखाना।
यही छोटे-छोटे कार्य भविष्य का इतिहास लिखते हैं।
माता-पिता अपने बच्चों को चलना सिखाते हैं। बोलना सिखाते
हैं। पढ़ना सिखाते हैं। ईमानदारी सिखाते हैं। अब समय आ गया है कि वे उन्हें एक और
मूल्य सिखाएँ—
जल का सम्मान करना।
क्योंकि आज जो बच्चा पानी बचाना सीखता है— वह कल पूरे
गाँव का भविष्य बचा सकता है।
आज की आने वाली पीढ़ियाँ हमसे कोई प्रश्न नहीं पूछ सकतीं। लेकिन
एक दिन वे अवश्य पूछेंगी—
"जब आपको पता था कि पानी समाप्त हो रहा है,
तब आपने उसे बचाया क्यों नहीं?"
क्या हमारे पास कोई उत्तर होगा? क्या हम कहेंगे—
हम व्यस्त थे?
हमें लगा कोई और बचा लेगा?
या हमने सुविधा को जिम्मेदारी से अधिक महत्वपूर्ण समझ लिया?
भविष्य हमारे उत्तर को कभी नहीं भूलेगा।
एक कृषिविज्ञानी के रूप में मैंने हजारों खेतों की यात्रा
की है। मैंने समय पर सिंचाई मिलने के बाद हरे-भरे खेतों को जीवन से भरते देखा है। और
मैंने सूखी, फटी हुई धरती के सामने खड़े किसानों की मौन प्रार्थनाएँ भी देखी हैं।
इन अनुभवों ने मुझे सिखाया—
जल केवल H₂O नहीं है।
जल आशा है। जल अन्न है। जल सम्मान है। जल जीवन है।
पृथ्वी को और अधिक भाषणों की आवश्यकता नहीं है। उसे ऐसे
लोगों की आवश्यकता है जो बहते हुए नल को बंद करें। जो वर्षा की प्रत्येक बूंद को
संजोएँ। जो खेतों में हर बूंद का विवेकपूर्ण उपयोग करें। जो बच्चों को जल का महत्व
सिखाएँ। मानव सभ्यता का भविष्य केवल संसदों या प्रयोगशालाओं में तय नहीं होगा। वह
प्रतिदिन हमारे घरों, खेतों, विद्यालयों और हमारे हृदयों में तय होगा।
आइए,
नदियों को स्मृति बनने से पहले बचा लें। जल संरक्षण को एक सप्ताह का
अभियान नहीं, बल्कि जीवन भर की संस्कृति बनाएँ।
क्योंकि—
जल केवल जीवन का स्रोत नहीं है।
जल मानव सभ्यता की धड़कन है।
"सबसे बड़ी त्रासदी वह दिन नहीं होगा जब अंतिम
नदी सूख जाएगी।
सबसे
बड़ी त्रासदी वह होगी जब उसके सूखने से पहले मनुष्य उसकी चिंता करना छोड़
देगा।"
"आज बचाई गई प्रत्येक बूंद, कल किसी की आशा बनती है।"
"जल हमें अपने पूर्वजों से विरासत में नहीं
मिला है; यह हमारी आने वाली पीढ़ियों से लिया गया एक अमूल्य
विश्वास है।"
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+91 7972815345

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