मौन विष (Pesticides) का फैलता जाल: समेकित कीट एवं रोग प्रबंधन ही सुरक्षित कृषि का भविष्य
"अधिक छिड़काव"
से "वैज्ञानिक संरक्षण" की ओर — यही है टिकाऊ कृषि का भविष्य
पिछले पाँच दशकों में भारत ने कृषि क्षेत्र में उल्लेखनीय
प्रगति की है। उन्नत किस्मों,
सिंचाई सुविधाओं, संतुलित उर्वरक प्रबंधन,
कृषि यंत्रीकरण तथा आधुनिक फसल संरक्षण तकनीकों ने भारत को
खाद्यान्न संकटग्रस्त राष्ट्र से विश्व के अग्रणी कृषि उत्पादक देशों की श्रेणी
में ला खड़ा किया है। इस विकास यात्रा में रासायनिक
कीटनाशकों एवं रोगनाशकों ने फसलों को कीटों, रोगों, खरपतवारों तथा अन्य जैविक चुनौतियों से बचाने
में अत्यंत महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। वैज्ञानिक आकलनों के अनुसार यदि इनका उचित
उपयोग न किया जाए, तो अनेक फसलों में 20 से 40 प्रतिशत तक उत्पादन हानि संभव है।
किन्तु आज कृषि के समक्ष एक गंभीर प्रश्न खड़ा है।
समस्या कीटनाशकों
के अस्तित्व की नहीं, बल्कि उनके अंधाधुंध, असंतुलित और अवैज्ञानिक उपयोग की है।
दुर्भाग्यवश अनेक किसानों में यह धारणा बन गई है कि अधिक मात्रा, बार-बार छिड़काव तथा कई
रसायनों का मिश्रण
अधिक उत्पादन की गारंटी है। यही भ्रम आज भारतीय कृषि, मानव स्वास्थ्य तथा
पर्यावरणीय संतुलन के लिए एक गंभीर चुनौती बन चुका है।
अब समय आ गया है कि उत्तरदायी
कीटनाशक प्रबंधन (Responsible
Pesticide Management)
को जन-आंदोलन का स्वरूप दिया जाए।
उचित उपयोग में
कीटनाशक कृषि के वरदान हैं
कोई भी कृषि वैज्ञानिक यह नहीं कह सकता कि कीटनाशकों की
आवश्यकता समाप्त हो गई है।
इन्होंने किसानों को—
·
विनाशकारी
कीट प्रकोप से फसल बचाने,
·
फफूंद
एवं जीवाणुजनित रोगों पर नियंत्रण,
·
गुणवत्ता
सुधार,
·
बाजार
योग्य उत्पादन बढ़ाने,
·
कटाई
उपरांत होने वाली क्षति कम करने,
·
तथा
देश की खाद्य सुरक्षा सुनिश्चित करने में महत्वपूर्ण योगदान दिया है।
अतः उद्देश्य कीटनाशकों
का पूर्ण निषेध नहीं,
बल्कि उनका वैज्ञानिक, आवश्यकता-आधारित एवं
उत्तरदायी उपयोग होना चाहिए।
वास्तविक प्रश्न यह नहीं कि—
"क्या कीटनाशकों का उपयोग किया जाए?"
बल्कि यह है—
"कब, कितनी मात्रा
में और किस वैज्ञानिक पद्धति से उनका उपयोग किया जाए?"
वास्तविक संकट:
आवश्यकता से अधिक उपयोग
देश के अनेक कृषि क्षेत्रों में कीटनाशकों का छिड़काव अब
वैज्ञानिक निर्णय नहीं, बल्कि एक नियमित आदत बन गया है।
आज अनेक किसान—
·
कीटों
की वास्तविक संख्या जाने बिना प्रत्येक 5–7
दिन में छिड़काव करते हैं।
·
अनुशंसित
मात्रा से अधिक सांद्रता अपनाते हैं।
·
एक
ही टंकी में अनेक रसायनों का मिश्रण करते हैं।
·
बार-बार
एक ही रासायनिक समूह का उपयोग करते हैं।
·
कटाई
से पूर्व आवश्यक प्रतीक्षा अवधि (PHI)
का पालन नहीं करते।
·
तथा
प्राकृतिक मित्र कीट सक्रिय होने पर भी अनावश्यक छिड़काव कर देते हैं।
ऐसी प्रवृत्तियाँ उत्पादन लागत बढ़ाने के साथ-साथ
दीर्घकालीन पर्यावरणीय एवं स्वास्थ्य संबंधी संकट भी उत्पन्न करती हैं।
सबसे पहले प्रभावित
कौन होता है?
अधिकांश लोग मानते हैं कि कीटनाशकों के अवशेष केवल उपभोक्ताओं
को प्रभावित करते हैं।
वास्तविकता इससे कहीं अधिक गंभीर है।
सबसे पहला शिकार स्वयं किसान होता है।
छिड़काव के दौरान कीटनाशक शरीर में त्वचा, श्वसन, आँखों, दूषित वस्त्रों, अनुचित
भंडारण तथा खाली डिब्बों के असुरक्षित निपटान के माध्यम से प्रवेश करते हैं।
लगातार संपर्क से त्वचा रोग, श्वसन विकार, तंत्रिका
तंत्र की समस्याएँ, हार्मोन असंतुलन, यकृत
एवं गुर्दों पर दुष्प्रभाव तथा अनेक दीर्घकालिक स्वास्थ्य जोखिम उत्पन्न हो सकते
हैं।
इसके पश्चात यही रसायन सम्पूर्ण पारिस्थितिकी तंत्र में
फैलने लगते हैं।
कीटनाशकों की अदृश्य
यात्रा
एक बार खेत में किया गया छिड़काव केवल फसल तक सीमित नहीं
रहता।
इसके अंश—
·
मिट्टी,
·
भूजल,
·
नदियों,
·
परागण
करने वाले कीटों,
·
मित्र
कीटों,
·
केंचुओं,
·
लाभकारी
सूक्ष्मजीवों,
·
पशु
आहार,
·
फल
एवं सब्जियों,
·
तथा
अंततः मानव खाद्य श्रृंखला तक पहुँच जाते हैं।
प्रकृति एक परस्पर जुड़ी हुई जीवन-व्यवस्था है। जब इसका एक
घटक प्रभावित होता है, तो सम्पूर्ण पारिस्थितिक संतुलन कमजोर होने लगता है।
भारत में सर्वाधिक
कीटनाशक उपयोग वाले राज्य
भारत का वार्षिक कीटनाशक बाजार लगभग ₹30,000–35,000 करोड़ का है। अनुमानित रूप से
सर्वाधिक उपयोग वाले राज्य हैं—
|
क्रम |
राज्य |
अनुमानित वार्षिक बाजार (₹ करोड़) |
|
1 |
महाराष्ट्र |
5,500–6,000 |
|
2 |
उत्तर
प्रदेश |
4,500–5,000 |
|
3 |
पंजाब |
3,500–4,000 |
|
4 |
आंध्र
प्रदेश एवं तेलंगाना |
3,000–3,500 |
|
5 |
गुजरात |
2,500–3,000 |
(ये आँकड़े उद्योग आधारित अनुमान
हैं; मौसम, फसल एवं कीट प्रकोप के
अनुसार इनमें परिवर्तन संभव है।)
समाधान केवल छिड़काव
नहीं—समेकित कीट एवं रोग प्रबंधन (IPM)
फसल सुरक्षा केवल रसायनों से संभव नहीं।
इसके लिए आवश्यक हैं—
·
स्वस्थ
बीज एवं प्रतिरोधी किस्में
·
संतुलित
पोषण
·
फसल
चक्र
·
नियमित
निगरानी
·
आर्थिक
क्षति स्तर (ETL) के आधार पर निर्णय
·
जैविक
नियंत्रण
·
आवश्यकता
पड़ने पर वैज्ञानिक रासायनिक नियंत्रण
जैविक और रासायनिक
नियंत्रण—प्रतिस्पर्धी नहीं, पूरक हैं
भविष्य की कृषि का आधार समेकित कीट एवं रोग प्रबंधन (Integrated Pest & Disease
Management - IPM)
है।
जैविक नियंत्रण के अंतर्गत ट्राइकोडर्मा, स्यूडोमोनास, ब्यूवेरिया, मेटाराइजियम, एन.पी.वी.,
ट्राइकोग्रामा, क्राइसोपर्ला, लेडीबर्ड बीटल जैसे मित्र जीव प्राकृतिक संतुलन बनाए रखते हैं।
वहीं रासायनिक नियंत्रण का उपयोग केवल—
·
अनुशंसित
मात्रा,
·
उचित
समय,
·
सही
तकनीक,
·
तथा
वैज्ञानिक सलाह के अनुसार किया जाना चाहिए।
उद्देश्य शून्य
कीटनाशक नहीं,
बल्कि सही
कीटनाशक,
सही मात्रा, सही समय और सही विधि होना चाहिए।
प्रयोगशाला से खेत और
खेत से प्रयोगशाला
भारत में प्रतिवर्ष हजारों शोधपत्र प्रकाशित होते हैं।
कृषि विश्वविद्यालय नई तकनीकें विकसित करते हैं।
वैज्ञानिक बेहतर अणु एवं जैविक समाधान खोजते हैं।
किन्तु सबसे बड़ा प्रश्न यह है—
इनमें से कितना ज्ञान वास्तव में किसान
के खेत तक पहुँचता है?
केवल शोधपत्र प्रकाशित कर देना कृषि विकास नहीं है।
वास्तविक परिवर्तन तब होगा जब वैज्ञानिक ज्ञान खेतों में
व्यवहारिक रूप से लागू होगा।
इसलिए "प्रयोगशाला से खेत" तथा "खेत से
प्रयोगशाला"—दोनों दिशाओं में ज्ञान का प्रवाह समान रूप से होना चाहिए।
हर गाँव में चाहिए फसल
सुरक्षा मिशन
अब समय आ गया है कि प्रत्येक गाँव में प्रशिक्षित कृषि
विशेषज्ञ किसानों को व्यवहारिक प्रशिक्षण दें।
इस अभियान में शामिल हों—
·
कृषि
विभाग
·
कृषि
विश्वविद्यालय
·
भारतीय
कृषि अनुसंधान परिषद (ICAR)
·
कृषि
विज्ञान केंद्र
·
वैज्ञानिक
·
कृषि
स्नातक
·
कीटनाशक
एवं जैविक उद्योग
·
प्रगतिशील
किसान
·
सेवानिवृत्त
कृषि अधिकारी
·
किसान
उत्पादक संगठन (FPO)
इनका उद्देश्य होना चाहिए—
·
साप्ताहिक
खेत निरीक्षण
·
रोग
एवं कीट की सही पहचान
·
सुरक्षित
कीटनाशक उपयोग
·
जैविक
नियंत्रण का प्रदर्शन
·
समेकित
कीट प्रबंधन का प्रशिक्षण
·
स्प्रे
कैलिब्रेशन
·
अवशेष
जागरूकता
·
प्रतिरोध
प्रबंधन
·
मित्र
कीटों का संरक्षण
·
व्यक्तिगत
सुरक्षा उपकरणों (PPE) का उपयोग
किसान सुरक्षित होगा, तभी
खाद्य सुरक्षा सुनिश्चित होगी
किसान केवल अन्नदाता नहीं, बल्कि भारत की खाद्य सुरक्षा का आधार है।
फसल सुरक्षा का उद्देश्य एक साथ तीनों की रक्षा होना चाहिए—
·
फसल
·
किसान
·
पर्यावरण
निष्कर्ष: अगली हरित
क्रांति ज्ञान आधारित होगी
भारत की अगली कृषि क्रांति अधिक रसायनों से नहीं, बल्कि अधिक ज्ञान से आएगी।
उत्तरदायी कीटनाशक उपयोग का अर्थ रसायनों का विरोध नहीं, बल्कि विज्ञान का
सम्मान है। रासायनिक एवं जैविक दोनों उपायों का संतुलित समन्वय ही टिकाऊ कृषि की
वास्तविक पहचान है।
भारत को कीटनाशकों
के विरुद्ध अभियान नहीं,
बल्कि वैज्ञानिक
एवं उत्तरदायी कीटनाशक प्रबंधन के राष्ट्रीय अभियान की आवश्यकता
है।
जब प्रत्येक गाँव में वैज्ञानिक फसल सुरक्षा की व्यवस्था
होगी, प्रत्येक
किसान समेकित कीट एवं रोग प्रबंधन को अपनाएगा और प्रत्येक छिड़काव वैज्ञानिक
निर्णय पर आधारित होगा, तभी हम स्वस्थ किसान, सुरक्षित भोजन, उर्वर मिट्टी और संतुलित पर्यावरण
वाली समृद्ध कृषि व्यवस्था का निर्माण कर सकेंगे।
भारत की कृषि का भविष्य इस बात से तय
नहीं होगा कि हम कितने कीटनाशकों का उपयोग करते हैं, बल्कि इस बात से तय
होगा कि हम उनका उपयोग कितनी वैज्ञानिक समझ और जिम्मेदारी के साथ करते हैं।
समेकित कीट एवं रोग
प्रबंधन पर विशेषज्ञ परामर्श
फसलों में कीट एवं रोगों की पहचान, समेकित कीट एवं रोग प्रबंधन (IPM), रासायनिक
एवं जैविक नियंत्रण, कीटनाशक एवं फफूंदनाशक चयन, प्रतिरोध प्रबंधन तथा टिकाऊ फसल सुरक्षा संबंधी वैज्ञानिक परामर्श के लिए
संपर्क करें—
श्री विजयकुमार सारूर
कृषि सलाहकार एवं
वरिष्ठ कृषि वैज्ञानिक (Agronomist)
📞 मोबाइल:
+91 7972815345
📧
ई-मेल: sarurvijay@gmail.com
"वैज्ञानिक मार्गदर्शन — स्वस्थ फसल,
अधिक उत्पादन और टिकाऊ कृषि की दिशा में आपका विश्वसनीय
सहयोगी।"
यह संस्करण उच्च-स्तरीय हिंदी, कृषि वैज्ञानिकों,
विश्वविद्यालयों, कृषि पत्रिकाओं तथा
नीति-निर्माताओं के लिए उपयुक्त शैली में तैयार किया गया है।

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