स्वच्छ भारत से सामर्थ्यशाली भारत तक!

 नरेंद्र मोदी सरकार के एक दशक के कार्यों का प्रखर लेखा-जोखा और विकसित भारत का हुंकारपूर्ण संकल्प


“देशभक्ति केवल तिरंगा लहराने, नारे लगाने या देश पर गर्व करने तक सीमित नहीं है। देशभक्ति का असली अर्थ है—राष्ट्र की प्रगति को पहचानना, सच्चाई के साथ खड़ा होना, देशहित में योगदान देना और भारत को विश्व की अग्रणी शक्ति बनाने के संकल्प के साथ आगे बढ़ना!”

प्रस्तावना : बदलाव आँखों के सामने है, तो उसे स्वीकार करने में संकोच कैसा?

2014 से भारत की यात्रा केवल सत्ता परिवर्तन की कहानी नहीं है, बल्कि देश की विकास संबंधी प्राथमिकताओं, प्रशासनिक कार्यशैली, बुनियादी सुविधाओं और वैश्विक भूमिका में आए अनेक महत्वपूर्ण बदलावों की कहानी भी है। नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में केंद्र सरकार ने स्वच्छता, सड़क एवं रेल अवसंरचना, डिजिटल क्रांति, राष्ट्रीय सुरक्षा, जनकल्याणकारी योजनाओं और विदेश नीति जैसे क्षेत्रों में कई महत्वपूर्ण पहल की हैं।

लेकिन आज एक बड़ा सवाल है—क्या देश की प्रगति का मूल्यांकन तथ्यों के आधार पर होगा, या राजनीतिक पूर्वाग्रहों और नकारात्मक प्रचार के चश्मे से?


मेरे विचार स्पष्ट हैं। किसी सरकार की आलोचना करनी है, तो ठोस तथ्य सामने रखिए। किसी योजना की विफलता बतानी है, तो प्रमाण प्रस्तुत कीजिए। किसी निर्णय से जनता को नुकसान हुआ है, तो उसका वास्तविक आकलन कीजिए। लेकिन यदि किसी क्षेत्र में सकारात्मक परिवर्तन हुआ है, तो केवल राजनीतिक विरोध के कारण उस उपलब्धि को नकारना आखिर कैसी निष्पक्षता है?


अपने क्षेत्र का उदाहरण ही लीजिए। 2014 से पहले कचरे के ढेर जमा होते थे और नियमित सफाई की व्यवस्था दिखाई नहीं देती थी। आज मेरे क्षेत्र में कचरा संग्रह करने वाली गाड़ी नियमित रूप से आती है और परिसर पहले की तुलना में स्वच्छ रहता है। यह मेरा व्यक्तिगत अनुभव है। मैं इसे पूरे भारत की स्थिति का प्रमाण नहीं बताता, लेकिन अपने सामने हुए बदलाव को झुठलाने का कोई कारण भी नहीं देखता।

रेल यात्रा और सार्वजनिक सुविधाओं के क्षेत्र में भी मुझे कई सकारात्मक बदलाव महसूस हुए हैं।


मेरा सीधा सवाल है—यदि बदलाव दिखाई दे रहा है, तो उसे स्वीकार करने में परेशानी क्यों? और यदि सरकार से कोई गलती हुई है, तो उसकी जवाबदेही तय करने से पीछे क्यों हटें?

लोकतंत्र में सरकार से सवाल करना नागरिक का अधिकार है। लेकिन तथ्यों को जाने बिना हर उपलब्धि को खारिज कर देना भी विवेकपूर्ण लोकतांत्रिक व्यवहार नहीं है।

आइए, भावनात्मक नारों से आगे बढ़ें और तथ्यों, अनुभवों तथा परिणामों के आधार पर भारत की विकास यात्रा का मूल्यांकन करें।


1. स्वच्छ भारत अभियान : गंदगी के विरुद्ध जनआंदोलन, सम्मान के लिए निर्णायक पहल!

2 अक्टूबर 2014 को शुरू हुए स्वच्छ भारत अभियान ने स्वच्छता को राष्ट्रीय चर्चा और जनभागीदारी के केंद्र में ला खड़ा किया। शौचालयों की उपलब्धता बढ़ाना, खुले में शौच की प्रथा को समाप्त करने के प्रयास, कचरा प्रबंधन और स्वच्छता के प्रति जनजागरूकता इस अभियान के प्रमुख उद्देश्य रहे हैं।

स्वच्छता केवल सड़कों को चमकाने का विषय नहीं है। यह स्वास्थ्य, सम्मान, पर्यावरण और नागरिकों की जीवन गुणवत्ता से सीधे जुड़ा प्रश्न है।

मेरे क्षेत्र में नियमित कचरा संग्रह की व्यवस्था से मुझे संतोष है। यह बदलाव मेरे दैनिक जीवन में दिखाई देता है। लेकिन स्वच्छ भारत की वास्तविक सफलता तभी मानी जाएगी, जब कचरे का पृथक्करण, गीले और सूखे कचरे का वैज्ञानिक प्रबंधन, पुनर्चक्रण और सुरक्षित निस्तारण भी प्रभावी ढंग से हो।

स्वच्छता पर राजनीति करने से बेहतर है स्वच्छता के परिणाम दिखाना। आलोचना करनी है, तो बताइए कि व्यवस्था कहाँ विफल है और उसे बेहतर कैसे बनाया जाए।

स्वच्छ भारत किसी एक व्यक्ति का नहीं, बल्कि 140 करोड़ से अधिक भारतीयों की जिम्मेदारी है।


2. सड़कें, राष्ट्रीय राजमार्ग और रेलवे : विकास की रफ्तार अब रुकनी नहीं चाहिए!

किसी राष्ट्र की आर्थिक शक्ति केवल उसके भाषणों से नहीं, बल्कि उसकी सड़कों, रेलवे, बंदरगाहों, परिवहन नेटवर्क और औद्योगिक सुविधाओं से भी मापी जाती है।

2014 के बाद केंद्र सरकार ने राष्ट्रीय राजमार्गों के विस्तार, ग्रामीण सड़कों, रेलवे विद्युतीकरण, रेलवे स्टेशनों के आधुनिकीकरण और आधुनिक रेल सेवाओं पर जोर दिया। पीएम गतिशक्ति के माध्यम से विभिन्न बुनियादी ढाँचा परियोजनाओं के एकीकृत नियोजन को बढ़ावा देने का प्रयास किया गया।

सड़क परिवहन एवं राजमार्ग मंत्रालय की 2025 की जानकारी के अनुसार, राष्ट्रीय राजमार्गों का नेटवर्क 2014 के लगभग 91,287 किलोमीटर से बढ़कर 2025 में लगभग 1,46,204 किलोमीटर तक पहुँच गया।

यह एक महत्वपूर्ण विस्तार है। विकास की चर्चा करते समय ऐसे आँकड़ों को सामने रखना चाहिए—न कि केवल राजनीतिक नारों को।

वंदे भारत जैसी आधुनिक रेलगाड़ियाँ, रेलवे विद्युतीकरण और रेल सुरक्षा के लिए कवच जैसी तकनीकें भी आधुनिकीकरण के प्रयासों का हिस्सा हैं।

लेकिन तस्वीर का दूसरा पक्ष भी स्पष्ट है। दुर्घटनाओं पर नियंत्रण, यात्रियों की सुरक्षा, समयपालन, स्वच्छता और भीड़ प्रबंधन में लगातार सुधार जरूरी है।

देश को ऐसी परिवहन व्यवस्था चाहिए, जो गाँव के किसान से लेकर महानगर के उद्यमी तक सभी को गति, सुविधा और आर्थिक अवसर दे।

विकास का अर्थ केवल सड़क बनाना नहीं, बल्कि उस सड़क से रोजगार, व्यापार, निवेश और समृद्धि के रास्ते खोलना है।


3. अनुच्छेद 370 : राष्ट्रीय एकीकरण की दिशा में ऐतिहासिक संवैधानिक कदम!

5 अगस्त 2019 को केंद्र सरकार ने जम्मू-कश्मीर से संबंधित अनुच्छेद 370 के प्रावधानों को निष्प्रभावी करने का निर्णय लिया। इसी अवधि में जम्मू-कश्मीर का पुनर्गठन किया गया और जम्मू-कश्मीर तथा लद्दाख दो केंद्रशासित प्रदेश बने।

यह भारत के संवैधानिक और राजनीतिक इतिहास का एक अत्यंत महत्वपूर्ण घटनाक्रम था।

11 दिसंबर 2023 को सर्वोच्च न्यायालय ने अनुच्छेद 370 से संबंधित निर्णय की संवैधानिक वैधता को बरकरार रखा।

इस निर्णय के समर्थक इसे राष्ट्रीय एकीकरण की दिशा में निर्णायक कदम मानते हैं। मेरे विचार में भी राष्ट्रीय एकता, समान अवसर और देश के सभी हिस्सों का विकास अत्यंत महत्वपूर्ण हैं।

लेकिन राष्ट्रीय एकता का वास्तविक अर्थ केवल संवैधानिक बदलाव तक सीमित नहीं हो सकता। जम्मू-कश्मीर में स्थायी शांति, रोजगार, पर्यटन, लोकतांत्रिक भागीदारी और नागरिकों के अधिकारों को भी मजबूत करना होगा।

भारत की एकता पर कोई समझौता नहीं; लेकिन एकता को मजबूत करने का सबसे प्रभावी मार्ग न्याय, विश्वास, विकास और समान अवसर भी हैं।

राष्ट्र की अखंडता के साथ-साथ प्रत्येक नागरिक का विश्वास जीतना भी उतना ही आवश्यक है।


4. राष्ट्रीय सुरक्षा : भारत की सीमाएँ, जवानों का सम्मान और स्वदेशी रक्षा शक्ति!

भारत की सुरक्षा कोई चुनावी नारा नहीं, बल्कि राष्ट्र के अस्तित्व, संप्रभुता और नागरिकों की सुरक्षा से जुड़ा सर्वोच्च दायित्व है।

थल सेना, वायु सेना और नौसेना का आधुनिकीकरण, सीमावर्ती बुनियादी ढाँचे का विकास, रक्षा उत्पादन में स्वदेशी भागीदारी और आधुनिक तकनीकों का उपयोग राष्ट्रीय सुरक्षा की दृष्टि से महत्वपूर्ण हैं।

‘मेक इन इंडिया’ और स्वदेशी रक्षा उत्पादन को प्रोत्साहित करने के प्रयासों ने घरेलू रक्षा उद्योग की भूमिका बढ़ाने पर जोर दिया है। रक्षा उत्पादन में हुई वृद्धि को केंद्र सरकार ने अपनी उपलब्धियों के रूप में प्रस्तुत किया है।

लेकिन इस विषय पर भावनाओं के साथ तथ्यों का सम्मान भी आवश्यक है। रक्षा उत्पादन, निर्यात, सैन्य क्षमता और वास्तविक परिचालन तत्परता अलग-अलग पहलू हैं। इन सभी का आकलन प्रमाणित आँकड़ों और परिणामों के आधार पर होना चाहिए।

भारतीय सैनिकों का बलिदान किसी एक राजनीतिक दल या सरकार की संपत्ति नहीं है। स्वतंत्रता के बाद से असंख्य जवानों ने राष्ट्र की रक्षा में अपना सर्वोच्च बलिदान दिया है।

उनके शौर्य का राजनीतिक लाभ उठाने के बजाय, उनका सम्मान करना, उन्हें आधुनिक उपकरण उपलब्ध कराना और उनके परिवारों का कल्याण सुनिश्चित करना हमारी जिम्मेदारी है।

राष्ट्र की सुरक्षा पर राजनीति हो सकती है, लेकिन राष्ट्रीय सुरक्षा को राजनीतिक स्वार्थ का बंधक नहीं बनाया जा सकता।

भारत की असली शक्ति उसके वीर जवानों, सक्षम वैज्ञानिकों, मजबूत रक्षा उद्योग और एकजुट नागरिकों में है।


5. डिजिटल इंडिया, जनधन और प्रत्यक्ष लाभ हस्तांतरण : तकनीक से जनता तक पहुँच!

डिजिटल तकनीक ने भारत के आर्थिक और प्रशासनिक ढाँचे में महत्वपूर्ण बदलाव किए हैं।

डिजिटल इंडिया, प्रधानमंत्री जनधन योजना, आधार आधारित सेवाओं और प्रत्यक्ष लाभ हस्तांतरण ने सरकारी सेवाओं तथा लाभों को नागरिकों तक पहुँचाने के लिए डिजिटल माध्यमों के विस्तार में भूमिका निभाई है।

यूपीआई ने छोटे दुकानदारों, किसानों, व्यापारियों और आम नागरिकों के लिए डिजिटल भुगतान को अधिक सुविधाजनक बनाया है। आज मोबाइल के माध्यम से भुगतान करना अनेक लोगों की दिनचर्या का हिस्सा बन चुका है।

प्रधानमंत्री आवास योजना, उज्ज्वला योजना, आयुष्मान भारत और प्रधानमंत्री किसान सम्मान निधि जैसी योजनाओं का उद्देश्य विभिन्न वर्गों को आवास, स्वास्थ्य, ऊर्जा और आर्थिक सहायता उपलब्ध कराना है।

लेकिन यहाँ भी सवाल पूछना जरूरी है।

क्या हर पात्र लाभार्थी तक योजना का लाभ पहुँच रहा है? क्या शिकायतों का समय पर समाधान हो रहा है? क्या डिजिटल सुविधाओं से वंचित नागरिकों को वैकल्पिक सहायता मिल रही है? क्या योजनाओं के वास्तविक परिणामों का पारदर्शी मूल्यांकन किया जा रहा है?

सरकारी योजना का असली मूल्य विज्ञापन में नहीं, बल्कि लाभार्थी के जीवन में आए बदलाव में होता है।

जहाँ योजनाएँ सफल हों, वहाँ उनकी सराहना होनी चाहिए। जहाँ कमियाँ हों, वहाँ सुधार की माँग भी उतनी ही मजबूती से उठनी चाहिए।


6. किसान, ग्रामीण विकास और आत्मनिर्भर भारत : किसान मजबूत, तो भारत मजबूत!

भारत की आत्मा गाँवों में बसती है और उसकी खाद्य सुरक्षा का आधार किसान है। इसलिए कृषि को कमजोर छोड़कर विकसित भारत का सपना पूरा नहीं किया जा सकता।

प्रधानमंत्री किसान सम्मान निधि, प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना, प्रधानमंत्री कृषि सिंचाई योजना और कृषि अवसंरचना निधि जैसी पहलों के माध्यम से कृषि क्षेत्र को सहायता देने के प्रयास किए गए हैं।

लेकिन कृषि की चुनौतियाँ बहुत बड़ी हैं। उत्पादन लागत, मौसम की अनिश्चितता, सिंचाई के लिए पानी, बाजार में कीमतों का उतार-चढ़ाव, भंडारण की कमी और किसानों की आय में स्थिरता आज भी गंभीर विषय हैं।

इन समस्याओं का समाधान केवल घोषणाओं से नहीं होगा। इसके लिए मजबूत बाजार व्यवस्था, वैज्ञानिक खेती, कृषि प्रसंस्करण, मूल्य संवर्धन, बेहतर भंडारण और किसानों को समय पर तकनीकी मार्गदर्शन देना होगा।

सूक्ष्म सिंचाई, ठिबक सिंचाई, तुषार सिंचाई, सौर पंप और जल संरक्षण के माध्यम से पानी का अधिक कुशल उपयोग किया जा सकता है। लेकिन तकनीक का लाभ तभी व्यापक होगा, जब वह किसानों के लिए किफायती, भरोसेमंद और व्यावहारिक हो।

आत्मनिर्भर भारत का अर्थ है—भारत अपनी आवश्यकताओं को पूरा करने की क्षमता बढ़ाए, अपने किसानों को सशक्त बनाए, अपने उद्योगों को विकसित करे और युवाओं के लिए रोजगार के अवसर पैदा करे।

जो राष्ट्र अपने किसान को सम्मान, पानी को संरक्षण और कृषि को लाभकारी अवसर नहीं दे सकता, वह विकसित भारत के लक्ष्य तक आसानी से नहीं पहुँच सकता।

किसान की समृद्धि, ग्रामीण अर्थव्यवस्था की मजबूती और जल संसाधनों का विवेकपूर्ण उपयोग राष्ट्रीय विकास के अनिवार्य स्तंभ हैं।


7. अंतरराष्ट्रीय मंच पर भारत : अब भारत की आवाज को अनदेखा करना आसान नहीं!

आज भारत अंतरराष्ट्रीय मंचों पर सक्रिय भूमिका निभा रहा है। विभिन्न देशों के साथ रणनीतिक साझेदारी, व्यापार, तकनीक, रक्षा, ऊर्जा और जलवायु परिवर्तन जैसे विषयों पर सहयोग बढ़ाने के प्रयास किए गए हैं।

2023 में भारत ने जी-20 शिखर सम्मेलन की मेजबानी की। ‘एक पृथ्वी, एक परिवार, एक भविष्य’ भारत की अध्यक्षता का केंद्रीय विषय था। ग्लोबल साउथ के देशों की चिंताओं को प्रमुखता देने पर भी जोर दिया गया।

भारत की विदेश नीति का मूल उद्देश्य राष्ट्रीय हितों की रक्षा, रणनीतिक स्वायत्तता, आर्थिक अवसरों का विस्तार और वैश्विक सहयोग को मजबूत करना होना चाहिए।

भारत की बढ़ती अंतरराष्ट्रीय भूमिका महत्वपूर्ण है। लेकिन इस भूमिका का मूल्यांकन केवल विदेशी दौरों, सम्मेलनों की तस्वीरों या मंचों पर दिए गए भाषणों से नहीं किया जा सकता।

हमें यह देखना होगा कि भारत को व्यापार, निवेश, तकनीक, ऊर्जा सुरक्षा, रोजगार और वैश्विक साझेदारी के क्षेत्र में क्या ठोस लाभ मिल रहे हैं।

भारत को दुनिया में सम्मान चाहिए, लेकिन वह सम्मान केवल शब्दों से नहीं—आर्थिक शक्ति, वैज्ञानिक क्षमता, विश्वसनीयता और राष्ट्रीय हितों की दृढ़ रक्षा से स्थायी बनता है।

भारत को एक ऐसी शक्ति बनना चाहिए, जिसकी आवाज वैश्विक निर्णयों में सुनी जाए और जिसकी प्रगति से उसके नागरिकों का जीवन बेहतर हो।


8. विपक्ष और आलोचना : सवाल पूछिए, लेकिन तथ्यों से भागिए मत!

लोकतंत्र में विपक्ष की भूमिका महत्वपूर्ण है। सरकार से प्रश्न पूछना, नीतियों की समीक्षा करना और कमियों को उजागर करना लोकतांत्रिक व्यवस्था की आवश्यक प्रक्रियाएँ हैं।

लेकिन लोकतंत्र का अर्थ यह भी नहीं कि हर सरकारी पहल को बिना जाँच के गलत घोषित कर दिया जाए या हर उपलब्धि को राजनीतिक पूर्वाग्रह के कारण नकार दिया जाए।

यदि किसी योजना में भ्रष्टाचार हुआ है, तो प्रमाण प्रस्तुत कीजिए। यदि किसी निर्णय से नुकसान हुआ है, तो वास्तविक आँकड़े सामने रखिए। यदि कोई परियोजना विफल हुई है, तो उसकी जवाबदेही तय कीजिए।

लेकिन यदि सड़क बनी है, सुविधा बेहतर हुई है, डिजिटल भुगतान का विस्तार हुआ है या किसी क्षेत्र में सार्वजनिक सेवा में सुधार आया है, तो उस बदलाव को स्वीकार करने में संकोच क्यों?

यही कसौटी सरकार के समर्थकों पर भी लागू होती है। सरकार के पक्ष में बोलने वाले नागरिकों को भी अप्रमाणित दावों, अतिशयोक्ति और भ्रामक सूचनाओं से बचना चाहिए।

मेरे क्षेत्र में सफाई की स्थिति सुधरी है, तो मैं यह अनुभव साझा कर सकता हूँ। मेरी रेल यात्रा अच्छी रही है, तो मैं यह बता सकता हूँ। लेकिन मैं इन अनुभवों के आधार पर यह दावा नहीं कर सकता कि देश के प्रत्येक नागरिक को समान लाभ मिला है।

उसी प्रकार, किसी एक स्थान की समस्या के आधार पर पूरे देश में हुए विकास को शून्य घोषित करना भी उचित नहीं है।

विकास की बहस में न अंधसमर्थन चाहिए, न अंधविरोध। चाहिए तथ्य, तर्क, प्रमाण और परिणाम!

लोकतंत्र में आवाज उठाइए, सवाल कीजिए, जवाबदेही माँगिए—लेकिन सत्य और प्रमाणों के साथ।


9. नरेंद्र मोदी का नेतृत्व और विकसित भारत का संकल्प : लक्ष्य बड़ा है, जिम्मेदारी उससे भी बड़ी!

2014 से नरेंद्र मोदी भारतीय राजनीति के प्रमुख नेतृत्वकर्ता रहे हैं। 2024 में उन्होंने तीसरी बार प्रधानमंत्री पद की शपथ ली। यह भारतीय लोकतंत्र की एक महत्वपूर्ण राजनीतिक घटना है।

उनके समर्थक उनकी नेतृत्व शैली, राष्ट्रीय सुरक्षा पर जोर, बुनियादी ढाँचे के विकास, डिजिटल परिवर्तन और अंतरराष्ट्रीय सक्रियता को भारत की बदलती विकास यात्रा के महत्वपूर्ण पहलुओं के रूप में देखते हैं।

मुझे भी भारत की प्रगति, भारतीयों के बढ़ते आत्मविश्वास और देश की वैश्विक क्षमता के विस्तार पर गर्व है। देश के लिए समय और ऊर्जा समर्पित करने वाले सार्वजनिक सेवकों के कार्यों का सम्मान होना चाहिए।

लेकिन मेरा राष्ट्रवाद किसी एक नेता तक सीमित नहीं है।

भारत किसी एक व्यक्ति से बड़ा है। भारत किसी एक सरकार से बड़ा है। भारत किसी एक राजनीतिक दल से भी बड़ा है!

हमारे संविधान की गरिमा, लोकतंत्र की शक्ति, किसानों का परिश्रम, जवानों का शौर्य, वैज्ञानिकों की प्रतिभा, श्रमिकों का पसीना और युवाओं के सपने—ये सब मिलकर भारत को महान बनाते हैं।

नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में लिए गए निर्णयों और सरकार की उपलब्धियों का मूल्यांकन तथ्यों के आधार पर होना चाहिए। जहाँ परिणाम सकारात्मक हैं, वहाँ प्रशंसा होनी चाहिए। जहाँ सुधार की आवश्यकता है, वहाँ स्पष्ट और निर्भीक सवाल उठने चाहिए।

विकसित भारत का लक्ष्य केवल एक नारा नहीं, बल्कि एक राष्ट्रीय जिम्मेदारी है।

इसके लिए आवश्यक है:

·         स्वच्छ शहर और आधुनिक गाँव।

·         किसानों के लिए लाभकारी कृषि और बेहतर जल प्रबंधन।

·         युवाओं के लिए गुणवत्तापूर्ण शिक्षा, कौशल और रोजगार।

·         प्रत्येक नागरिक के लिए सुलभ और गुणवत्तापूर्ण स्वास्थ्य सेवाएँ।

·         महिलाओं की सुरक्षा, सम्मान और आर्थिक भागीदारी।

·         उद्योग, अनुसंधान और स्वदेशी तकनीक में निरंतर प्रगति।

·         सामाजिक न्याय, पर्यावरण संरक्षण और पारदर्शी प्रशासन।

विकसित भारत भाषणों से नहीं बनेगा। विकसित भारत बनेगा नीतियों के प्रभावी क्रियान्वयन, नागरिकों के परिश्रम, जवाबदेही और सामूहिक संकल्प से!


निष्कर्ष : मेरा भारत, मेरा अभिमान—और भारत की प्रगति के लिए मेरा संकल्प!

2014 के बाद भारत ने अनेक क्षेत्रों में महत्वपूर्ण परिवर्तन देखे हैं। कुछ क्षेत्रों में उल्लेखनीय प्रगति हुई है, जबकि कुछ क्षेत्रों में चुनौतियाँ अभी भी गंभीर हैं। इन दोनों वास्तविकताओं को स्वीकार करना कमजोरी नहीं, बल्कि परिपक्व राष्ट्रभावना का प्रमाण है।

मेरे क्षेत्र में स्वच्छता की स्थिति में आया बदलाव मुझे संतोष देता है। रेल यात्रा और सार्वजनिक सुविधाओं में महसूस हुई प्रगति मुझे प्रसन्न करती है। राष्ट्रीय एकता, देश की सुरक्षा और अंतरराष्ट्रीय मंच पर भारत की सक्रिय भूमिका के प्रति भी मेरे मन में गर्व है।

इसलिए मेरी बात स्पष्ट है—

अच्छे काम का खुलकर समर्थन करो!

गलत काम का निर्भीक विरोध करो!

हर दावे की तथ्यात्मक जाँच करो!

जनता के पैसे, अधिकारों और भविष्य के प्रति जवाबदेही माँगो!

और सबसे बढ़कर—देश की प्रगति में अपना योगदान दो!

नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में भारत की विकास यात्रा के प्रति मेरा सकारात्मक दृष्टिकोण है। लेकिन मेरा सर्वोच्च गौरव किसी व्यक्ति, पद या राजनीतिक दल में नहीं—मेरा सर्वोच्च गौरव भारत माता, हमारे संविधान, हमारी लोकतांत्रिक परंपराओं, हमारी संस्कृति और करोड़ों भारतीयों की सामूहिक शक्ति में है।

राजनीतिक मतभेद लोकतंत्र की स्वाभाविक पहचान हैं। लेकिन मतभेदों को राष्ट्रहित, सामाजिक सद्भाव और देश की प्रगति के रास्ते में बाधा नहीं बनने देना चाहिए।

हमारी मंजिल स्पष्ट होनी चाहिए—ऐसा भारत जहाँ किसान समृद्ध हो, युवा आत्मनिर्भर हों, महिलाएँ सुरक्षित हों, गरीबों को अवसर मिलें, उद्योग आगे बढ़ें और प्रत्येक नागरिक सम्मान के साथ जीवन जी सके।

आइए, भारत की उपलब्धियों को स्वीकार करें, उसकी कमियों को दूर करने का संकल्प लें और अपने देश को अधिक सक्षम, समृद्ध, सुरक्षित तथा आत्मनिर्भर बनाने के लिए एकजुट होकर काम करें।

राष्ट्र सर्वोपरि!

नागरिकों का सम्मान सर्वोच्च!

विकसित भारत हमारा सामूहिक संकल्प!

जय हिंद! जय भारत! वंदे मातरम्! 

“देश के हित में तथ्य बोलेंगे, विकास के लिए संकल्प लेंगे और भारत की गरिमा के लिए मिलकर आगे बढ़ेंगे!”





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